AK Anjani Kumari · 27 Jul
उत्तर:-
प्रेमचंद के साहित्यिक विकास को आदर्शवाद से यथार्थवाद की ओर संक्रमण के रूप में देखा जाता है। उनके आरंभिक उपन्यासों में आदर्शवादी दृष्टिकोण अधिक प्रभावी है। जबकि गोदान तक आते-आते जीवन की कठोर वास्तविकताओं और सामाजिक विषमताओं का चित्रण अधिक मुखर हो जाता है। अतः यह कहना उचित होगा कि प्रेमचंद का आदर्शवादी समाधान में विश्वास कमजोर हुआ, किंतु आदर्शवाद से उनका पूरी तरह मोहभंग नहीं हुआ।
यह बात गोदान के पात्रों और उनकी जीवन दृष्टि के माध्यम से भी स्पष्ट होती है। धनिया का मानवीय व्यवहार, झुनिया को स्वीकार करना, गोबर का रूढ़ियों के विरुद्ध विद्रोह तथा मेहता-मालती के मानवीय मूल्यों के प्रति आग्रह प्रेमचंद के 'मानवतावादी' आदर्श को व्यक्त करते हैं।
अतः 'गोदान' तक आते-आते प्रेमचंद का आदर्शवादी समाधानवाद से मोहभंग अवश्य होता है परंतु आदर्शवाद से पूर्णतः नहीं। उनका आदर्शवाद यथार्थ के धरातल पर उतरकर यथार्थवादी मानवतावाद में परिवर्तित हो जाता है। यही गोदान की सबसे बड़ी वैचारिक विशेषता है।